जातिगत आरक्षण को समाप्त करने के समर्थक तो बहुत हैं पर जातिगत भावना को खत्म नहीं करना चाहते !

मेरा ये स्टेटस कुछ लोगो को बूरा सकता हैं पर ये कितना दुखद हैं, कि जातिगत आरक्षण को समाप्त करने के समर्थक तो बहुत हैं पर समाज में फैली जातिगत भावना को कोई खत्म नहीं करना चाहता... क्योंकि समाज में वो समानता वहीं चाहते.. वो समानता बस नौकरी प्राप्त करने में चहाते हैं...समाज में उनको उच्चता व निम्नताएँ पंसद हैं....पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक दलित को बस इसलिये मार दिया गया क्योंकि उसने अपने बच्चे का नाम वो रखा था जो एक ठाकुर ने अपने बच्चे का रखा था...
मैं नौकरी में आरक्षण का समर्थन नहीं करता,समाज में विषमता कहीं भी सही वो खत्म होनी ही चाहिये...लेकिन ये भेदभाव की गहरी विभाजक रेखाएँ हर जगह से मिटनी चाहिए... ना जाने ऐसे कितने उच्च सिक्षित परिवार आपको ये कहते मिल जाएंगे की हमें अंतरजातिय विवाह से कोई आपत्ति नहीं बस लडका नीची जात का ना हो...ये कितना हास्यपद हैं कि महान आर्यवृत, महान हिन्दुस्तान में किसी का ऊँचा नीचा होना उसके कर्मो से नहीं ब्लकि उसकी जाति से निर्धारित किया जाता हैं...
मेरे एक बेहद पढे लिखे परम मित्र ने एक स्टेटस फेसबुक पर डाला कि ब्राह्मण को देश का राष्ट्रीय पुरुष घोषित होना चाहिये ,तो एक सवाल मन में आया कि देश दुनिया को दहलाने वाले दामनि रेप और हत्याकांड में सामिल विनय शर्मा का कया किया जाये...उसे बस इसलिये छोड दिया जाये कि वो एक ब्राह्मण हैं...नहीं,,,, किसी की जाति उसके उच्चतम होने का प्रमाण नही होती,किसी के भी कर्म ये निर्धारित करते हैं कि वो कितना ऊँचा या कितना नीचा हैं..जिन्होंने ये माना वो तरक्की करते रहे,जिन्होंने नहीं माना वो खुद ही की खोदी गई विचारधारओं की संकीर्ण कब्र में सडते रहे ,सिसकते रहे...
आजकल तमाम जातिगत मैस्ज व्हाटसप ओर फेसबुक पर चलते रहते हैं...पंडित,जाट,गूर्जर,ब्राह्मण,ठाकुर की ऐसी ऐसी वीरता का बखान होता हैं कि पूछिये मत,पर साहेबान एक सवाल फिर भी दिल दुखाता हैं,कि इतनी वीर जातियों के होने के बावाजूद भी कैसे हजारों साल तक हम गूलाम रहे...क्यूँ कोई हिन्दूस्तान को गुलाम होने से नहीं बचा पाया..इसके मूल में बस एक ही कारण हैं,एक ही रहस्य हैं,कि सदियों से जातिगत खाँचो में बटाँ भारतीय समाज कभी एक हो ही नहीं पाया..विदेशी आक्रमणकारी आते रहे, हमे लूटते ओर खसोटते रहे,पर हम कभी एक ना हो सके...
सदीयों पूरानी ऐतिहासिक गलतियाँ आज भी दोहराई जा रही हैं..आरक्षण का विरोध कीजिये पर साथ के साथ उस विचारधारा का भी विरोध कीजिये जो हमें एक नहीं होने देती...वो विचारधारा जिसने हजारो सालो तक हमारे ही दलित भाई बहनों पर सोचो से परे अक्लपनीय अत्याचार किये...समाज में समानता की एक समरस धारा बहे उसके लिये जरूरी हैं कि पहले हम अपनी खुदगर्ज सोचों पर बाँध बाधे....Rohit Teavatya




इस्लाम के भयानक अत्याचार सहे, आत्मा तक को तोड़ देने वाला सिर पर मल-मूत्र ढोने का अत्याचार सहा, पशुओं की खाल उतारने कार्य किया, चमड़ा कमाने-जूते बनाने का कार्य किया मगर मुसलमान नहीं हुए। ये जाटव, बाल्मीकि समाज के लोग हमारे उन महान वीर पूर्वजों की संतानें हैं। आज भी इन योद्धा जातियों के वंशजों के बड़े हिस्से में अपने नाम के साथ सिंह लगाने की परम्परा है। अपने सिर पर मल-मूत्र ढोने वाले, जूते बनाने वाले कहीं सिंह होते हैं ?
ये वस्तुतः सिंह ही हैं जिन्हें गीदड़ बनने पर विवश करने के लिये इस तरह अपमानित किया गया।बाबा साहब अम्बेडकर ने भी अपने लेखों में लिखा है कि हम योद्धा जातियों के लोग हैं। यही कारण है कि 1921 की जनगणना के समय चमार जाति के नेताओं ने वायसराय को प्रतिवेदन दिया था कि हमें राजपूतों में गिना जाये। हम राजपूत हैं। अँगरेज़ अधिकारियों ने ही ये नहीं माना बल्कि हिन्दू समाज भी इस बात को काल के प्रवाह में भूल गया और स्वयं भी इस महान योद्धाओं की संतानों से वही घृणित दूरी रखने लगा जो आक्रमणकारी रखते थे। होना यह चाहिए था कि इनकी स्तुति करता, नमन करता, इनको गले लगता मगर शेष हिन्दू समाज स्वयं आक्रमणकारियों के वैचारिक फंदे में फंस गया।