चीन का सामना करने की तैयारी में लगी, मोदी सरकार
चीन सीमा पर भारत बढ़ाएगा हैवी इन्फ्रास्ट्रक्चर से पैठ चाइना के लाइन ऑफ़ एक्चुअल कण्ट्रोल(LAC) में बढ़ते इन्फ्रास्ट्रक्चर ने नई-दिल्ली को बॉर्डर इश्यूज पर दोबारा नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है । LAC को अपनी मिलिट्री पोस्ट्स को वेल कनेक्टेड रखने के लिए वह लगातार बेहतरीन हाईवे,लॉजिस्टिक डिपो और रेल नेटवर्क का निर्माण किये जा रहा है ।ऐसे में उत्तर-पूर्वी राज्यों से लगी चीन की सीमा में मिलिट्री क्षमता बढाने के लिए उच्च गुणवत्ता के मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर की महती आवश्यकता है ।हाल में ही इस दिशा में रक्षा मंत्रालय ने रेलवे को नार्थ-ईस्ट में चार रेलवे लाइन परियोजनाओं के लिए 1.4 लाख करोड़ रुपये का फंड देने की घोषणा की है ।

हम आपको बताएँगे क्यों है इसकी जरूरत और क्या है इन परियोजनाओं का सामरिक महत्व।
1) रेल मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय 1400 किलोमीटर लम्बी रेलवेलाइन प्रोजेक्ट्स को संयुक्त रूप से कार्यान्वित करने में लगे हुए हैं ।दुर्गम भूभाग होने के कारण लगभग 90 से 100 करोड़ रूपये की लागत एक किलोमीटर लम्बी रेलवे लाइन बनाने में खर्च की जायेगी ।
2) इस महत्वाकांक्षी रेलवे प्रोजेक्ट्स का प्रारंभिक सर्वे किया जा चुका है,ये रेलवे लाइन मुर्कोंग्सेलेक से रुपाई (वाया पासीघाट,तेजू,परशुराम कुंड ) तक, मीसामरी(A.P.) से तवांग(A.P.) तक,उत्तरी लखीमपुर(असम) से सिलापठार(असम) तक और बिलासपुर(H.P.) से लेह तक बनायी जायेगी ।
3) भारत सीमावर्ती इलाकों में रेलवे लाइन बिछाने में चीन से बुरी तरह पिछड़ा हुआ है ।सिक्किम से लगे हुए क्षेत्र में ल्हासा से जिगाजे के बीच 258 किलोमीटर लम्बा रेल नटवर्क रच कर चीन ने भारत को घेरने के अपने इरादे जाता दिए हैं ।
4) इतना ही नहीं अरुणाचल जिसे चीन दक्षिणी तिब्बत बता कर अपनी लार टपकाये हुए है,की सीमा पर बीजिंग अपनी पैठ बनाने के लिए करीब साढ़े चार सौ किमी. लम्बी रेल लाइन का भी गुपचुप सर्वे भी कर चूका है ।तिब्बत ऑटोनोमस रीजन में चीन द्वारा बनाए गए 58000 किलोमीटर लम्बे रोड
नेटवर्क के मुकाबले,हमारा ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क भी बहुत घटिया स्तर का है ।
5) एहतियात के तौर पे दसवीं पंचवर्षीय योजना में भारत सरकार ने 1905.6 KM लम्बाई की 36 सड़कों के निर्माण कार्य के लिए 1696 करोड़ रूपये की मंजूरी प्रदान की थी ।परन्तु कई कारणों से ये परियोजनायें अब भी अधर में लटकी हुई हैं ।
6) चूँकि उत्तर-पूर्व का इलाका हैवी फाल रीजन है,यहाँ औसतन 2000 मिलीमीटर बरसात होती है इसलिए लैंड स्लाइड जैसी नैचुरल कैलेमिटीज आम बात हैं ।इससे सबसे ज्यादा नुक्सान इन्फ्रास्ट्रक्चर को ही होता है ।निश्चित समयावधि में सड़कों और अन्य परिवहन मार्गों का रखरखाव एक वाकई एक बड़ी चुनौती है ।
7) सड़क और रेल परिवहन की चुनौतियां एयर कनेक्टिविटी भी बाधित हो रही है,मिसाल के तौर पर नवें फाइव इयर प्लान में गवर्मेंट ने अरुणाचल प्रदेश में 6 एयर पोर्ट बनाने का प्रावधान रखा था जो की एयर बस और कार्गो एयरक्राफ्ट को रिसीव करने में सक्षम था ।उबड़-खाबड़ और असमतल सतह इस परियोजना में भी खलल डालने में कोई कसर नहीं छोड़े है ।आलम ये है कि नार्थ-ईस्ट में केवल गुवाहाटी और अगरतला में ही नाईट लैंडिग की सुविधा है ।
8) चीन हमारी इस भौगोलिक मजबूरी का भी पर्याप्त फायदा ले रहा है,PLA की सहूलियत और विवादित सीमा क्षेत्र में वर्चस्व बढाने के लिए उसने व्यापक पैमाने पर इन्वेस्टमेंट की है ।इस क्षेत्र में चीन और भारत की सेना में 3:1 का अनुपात है ।
9) हालाँकि इन्डियन एयर फ़ोर्स (IAF) ने यहाँ सुखोई-30 MKI के 4 squardan तैनात कर रखे हैं,सेना भी पूरी मुस्तैदी से चीन की घुसपैठ और हमले को नाकाम करने में सक्षम है ।इस बहुप्रतीक्षित रेलवे लाइन बिछाने की योजना के सही समय पर सफलता पूर्वक कार्यान्वित होने से सेना की ताकत कई गुना बढ़ जायेगी ।
10) यह परियोजना स्ट्रैटिजिकली काफी लाभदायक हो सकती है ।उदाहरण के लिए मीसापुर(असम) से तवांग की बीच की 378 किलोमीटर रेल लाइन रणनीतिक रूप से काफी कारगर होगी,क्योंकि इससे तवांग सीधे तौर पर आर्मी के नार्थ-ईस्ट हेड-क्वार्टर से जुड़ जाएगा जिसका हेड लेफ्टीनेंट जनरल रैंक का अधिकारी होता है ।
11) रेलवे नेटवर्क तैयार होने से ट्रासपोर्ट बढेगा जिससे गुड्स की कॉस्ट कम होगी,जिससे यहाँ के निवासियों का जीवन स्तर सुधरेगा ।इससे विकास और रोजगार के नए अवसर भी बड़े पैमाने पर पैदा होंगे ।
12) दो मंत्रालयों का परस्पर को-आर्डिनेशन देश के भविष्य के लिए बहुत शुभ है ।हालाँकि इसका सामरिक महत्व ज्यादा होने से रक्षा मंत्रालय द्वारा रेलवे परियोजना पर दिया गया फंड कोई विशेष आश्चर्य का विषय नहीं है ।इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय नार्थ-ईस्ट के लिए अल्टरनेटिव मार्ग बनाने के लिए,सकरी-निर्मली रेलवे लाइन प्रोजेक्ट में रक्षा मंत्रालय ने रेलवे को 350 करोड़ का फंड दिया था । सीमा पर खलबली और आतंक मचा कर विस्तारवादी विनिर्माण को अब भारत से कड़ी चुनौती मिलेगी ।
"सन 1962 से अब तक चीन ने हमारी इस कमजोरी का खूब फायदा उठाया,अब बारी बीजिंग की है"