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बड़ा प्रश्न है कि ऐसे समय गुजरात सरकार एवं केन्द्र सरकार को क्या करना चाहिए l

बड़ा प्रश्न है कि ऐसे समय गुजरात सरकार एवं केन्द्र सरकार को क्या करना चाहिए? यह तो साफ है कि यह हिंसा अनावश्यक है। जिनकी मौत हुई है उनको मारे जाने का कोई कारण नहीं है। किसी मांग को आप इस तरह बारुद की ढेर पर खड़ा करके आग लगाते हैं तो ऐसी ही नौबत आएगी। हार्दिक नाम के इस 22 साल के लड़के ने नेता बनने या हीरो बनने के चक्कर में जिस तरह रैलियां करते हुए अहमदाबाद की महारैली की, उन सबमें उसने और उसके साथियों ने जैसा भाषण दिया उससे जो उत्तेजना पैदा हुई उसमें कुछ भी हो सकता था।
एक सूचना तो यह है कि मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के ही कुछ विरोधियों ने सीधे उनका विरोध करने की जगह हार्दिक जैसे नासमझ और जातीय उन्माद से ग्रस्त नवजवान तथा उसके साथियों को आगे किया। शायद लक्ष्य यह था कि आंदोलन इतना बड़ा हो जाए कि आनंदीबेन संभाल न सकें और दूसरा कोई मुख्यमंत्री बने। अगर इसमें थोड़ी भी सच्चाई है तो ऐसे लोगों को चिन्हित कर उनको ऐसा दण्ड मिलना चाहिए जिससे दूसरे इस तरह कभी भीतरघात नहीं करे। किंतु अंदरुनी लड़ाई को हिंसा की ऐसी ज्वाला में झोंकने की भूमिका नहीं अपनाई जातीं। तो आखिर इस तरह की हिंसा को क्या माने?

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यह कौन सी जिद थी कि मुख्यमंत्री यही आकर ज्ञापन लें तो हम देंगे नहीं तो यही अनशन पर डट जाएंगे। यह आंदोलन का तरीका होता नहीं। एक तो आरक्षण की इनकी मांग गलत। इसकी वर्तमान संवैधानिक और उच्चतम न्यायालय के आदेश के दायरे में पूर्ति असंभव। दूसरे, इसे आग की तरह फैला देना, आग पर पानी डालने का कोई पूर्वोपाय नहीं। हार्दिक नामक यह लड़का और उसके साथी हीरो से विलेन बन चुके हैं। आने वाला समय इन्हें ऐसे खलनायक के रुप में याद करेगा जिनने बिना कारण गुजरात को धू धू कर जलाया, लोगों को मरने के लिए आग में झोंका, गुजरात की शांति भंग कर दी, जातीय उन्माद और द्वेष का विष वृक्ष लगा दिया। स्थिति इतनी बिगड़ रही है और आप गुजरात बंद का आह्वान कर देते हो। यह किसके लिए और क्यों? कौन हैं आपके मार्गदर्शक?

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हालांकि यह दुर्भाग्य है कि दूसरी पार्टियों के नेता गुजरात में शांति की अपील करने की जगह केवल नरेन्द्र मोदी या गुजरात सरकार का उपहास उड़ा रहे हैं या आरोपित कर रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हार्दिक की मांग का न केवल समर्थन किया, बल्कि उससे नई पीढ़ी का उभरता हुआ नेता बता दिया। क्या नीतीश कुमार उसकी भाषा एवं उससे पैदा हुई हिंसा का समर्थन करते हैं? लालू यादव ने मजाक उड़ाया है कि क्या यही है गुजरात मॉडल? आपने भी तो प्रदेश में एक समय आरक्षण के नाम पर सवर्ण एवं अवर्णों में संघर्ष कराया था। जगह जगह जातीय सेनाएं बन गईं, सामूहिक कत्ल होने लगे। आपका यह बिहार मॉडल तो किसी के काम का नहीं रहा। उसे क्यों नहीं याद करते। यह हिंसा पर राजनीतिक रोटी सेंकना है। इसकी निंदा होनी चाहिए। कांग्रेस से लेकर किसी पार्टी ने हिंसा रोकने की अपील नहीं की है। सब केवल आलोचना, निंदा और उपहास में लगे हैं। राजनीतिक मतभेद अपनी जगह है किंतु ऐसी स्थिति में राजनीति से परे उठकर सबको शांति स्थापना एवं जातीय उन्माद को कम करने की अपील के साथ आगे आना चाहिए।