(क्या) सरकार चलाने के लिए भ्रष्टाचार जरुरी : उत्तराखंड हाई कोर्ट
उत्तराखंड में सियासी जंग थमने का नाम नहीं ले रही है। पिछले महीने हरीश रावत की सरकार पार्टी के 9 विधायकों के बागी होने से सरकार अल्पमत में आ गई थी। इस कारण उत्तराखंड में कश्मकश जारी है। इसी कश्मकश में आज हाई कोर्ट ने सविधान की सारी मर्यादा को लाँघ कर देश के सविधान को अपमानित किया है। एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा की देश में कोई भी सरकार भ्रष्टाचार के बिना नहीं चलती है। किसी भी सरकार को पांच साल पूरा करने में भ्रष्टाचार करना बहुत जरुरी होता है। यदि सरकार भ्रष्ट नहीं होगी तो देश में कोई सरकार पांच दिन से अधिक नहीं चलेगी।उत्तराखंड हाई कोर्ट में मुख्य न्यायधीश के एम जोसेफ और न्यायधीश वी के विष्ट की खंडपीठ में सुनवाई की जा रही है। कोर्ट ने पूछा की क्या उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागु करने का पर्याप्त आधार है ?
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा की देश में कोई भी सरकार भ्रष्टाचार के बिना नहीं चलती है। किसी भी सरकार को पांच साल पूरा करने में भ्रष्टाचार करना बहुत जरुरी होता है। यदि सरकार भ्रष्ट नहीं होगी तो देश में कोई सरकार पांच दिन से अधिक नहीं चलेगी।


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उत्तराखंड हाई कोर्ट में मुख्य न्यायधीश के एम जोसेफ और न्यायधीश वी के विष्ट की खंडपीठ में सुनवाई की जा रही है। कोर्ट ने पूछा की क्या उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागु करने का पर्याप्त आधार है ? केंद्र सरकार के अधिवक्ता अटॉर्नी जेनरल मुकुल रोहतगी ने दलील देते हुए कहा की स्पीकर ने यदि कोई गलती की है तो आप ( कोर्ट) इस पर रोक लगा सकती है। यह अधिकार आपके पास है। उन्होंने कहा की स्पीकर को जो अधिकार दिया गया है उसकी टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट में हो रखी है। भारत में न्यायपालिका सर्वोच्च है। अतः कोर्ट के पास यह अधिकार है।
मुकुल रोहतगी ने अपने दलील में कहा की केंद्र सरकार ने स्पीकर के आदेश को चुनौती नहीं दी क्योंकि स्पीकर अपना राग अलाप रहे थे। 18 मार्च को जब सरकार अल्पमत में थी तो स्पीकर ने ध्वनिमत से विनियोग पारित कर दिया। मुकुल रोहतगी के बयान पर उत्तराखंड कांग्रेस सरकार के मनु सिंघवी ने कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा की विपक्षी पार्टी के पास विपक्ष के लिए पर्याप्त27 सीट नहीं थे। इस पर मुकुल रोहतगी ने कहा की 18 मार्च को सुबह में ही विपक्ष के 27 विधायकों एक पत्र पर हस्ताक्षर कर राजयपाल को पत्र सौंपा था। किन्तु स्पीकर ने इसे असंगत बताया। जिस कारण राज्य में राष्ट्रपति शासन लागु किया गया।
मुकुल ने अपने दलील में कहा की स्पीकर सरकार को बचाने की पूरी कोशिश की। किन्तु कामयाब नहीं हुए। जब 9 विधायकों ने फ्लोर टेस्ट के लिए जारी था तो उस समय स्पीकर ने इन सबो की सदस्य्ता रद्द कर दी। ऐसे में केंद्र सरकार के पास 356 धारा लागू करने का पर्याप्त आधार थे।उत्तराखंड हाई कोर्ट के इस टिप्पणी से भारतीय सविधान की गरिमा को ठेस पहुंची है। जंहा राज्य के सर्वोच्च व्यक्ति यदि इस तरह की टिपण्णी करते है तो ये राज्य के लिए बड़े ही दुर्भाग्य की बात है। आजादी के60 साल तक के इतिहास में कभी किसी खंडपीठ अथवा न्यायधीश ने इस तरह की टिपण्णी नहीं की है। जो आज उत्तराखंड हाई कोर्ट ने दी है। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट को त्वरित संज्ञान लेना चाहिए और उत्तराखंड के न्यायधीश के एम जोशेफ और वी के विष्ट को तत्काल इस पद से निलंबित कर देना चाहिए।