जटामांसी नामक जड़ीबूटी कश्मीर, भूटान, सिक्किम और कुमाऊं जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में अपने आप उगती है, इसे ‘बालछड़’ के नाम से भी जाना जाता है. जटामांसी ठण्डी जलवायु में उत्पन्न होती है, इसलिए यह हर जगह आसानी से नहीं मिलती. इसे जटामांसी इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसकी जड़ में बाल जैसे तन्तु लगे होते हैं.!
सावधानी : जटामांसी का ज्यादा उपयोग करने से गुर्दों को हानि पहुंच सकती है और पेट में कभी भी दर्द शुरू हो सकता है.
सही मात्रा : 2 से 4 ग्राम जड़ का चूर्ण और काढ़ा 10 मिलीलीटर.!
लाभ:......- *इसके सेवन से बाल काले और लम्बे होते है.
- इसके काढ़े को रोजाना पीने से आंखों की रोशनी बढ़ती है.
- इसे पानी में पीस कर जहां लेप कर देंगे वहाँ का दर्द ख़त्म हो जाएगा. विशेषतः सर का और हृदय का.
- इसको खाने या पीने से मूत्रनली के रोग, पाचननली के रोग, श्वासनली के रोग, गले के रोग, आँख के रोग,दिमाग के रोग, हैजा, शरीर में मौजूद विष नष्ट होते हैं.
- मस्तिष्क और नाड़ियों के रोगों के लिए ये राम बाण औषधि है, ये धीमे लेकिन प्रभावशाली ढंग से काम करती है. पागलपन, हिस्टीरिया, मिर्गी, नाडी का धीमी गति से चलना, मन बेचैन होना, याददाश्त कम होना इन सारे रोगों की यही अचूक दवा है
Anil Kumar Goyal