
डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ अंतिम 11 दिन !
श्री उमाशंकर त्रिवेदी, पहली लोकसभा में चित्तौड़ (राजस्थान) से जनसंघ के सांसद थे। वे डा.श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कानूनी सलाहकार थे और जम्मू-कश्मीर आंदोलन के दौरान जून, 1953 में डाक्टर मुखर्जी की गिरफ्तारी तथा नजरबंदी को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देकर अवैध घोषित कराने के लिए प्रयत्नशील रहे थे। इस संबंध में डा.मुखर्जी से कानूनी परामर्श करने के लिये वे श्रीनगर गये थे और उनकी मृत्यु तक वहीं थे। उन्होंने डा.मुखर्जी के साथ बिताए अंतिम 11 दिनों का विवरण एक लेख द्वारा भारत सरकार तथा जनता के सम्मुख रखा था। हम यहां उसी लेख के संपादित अंश प्रस्तुत कर रहे हैं।
सं. उमाशंकर त्रिवेदी : मैं डा.मुखर्जी से पहली बार 12 जून को मिला। मेरे साथ जिला मजिस्ट्रेट भी थे। अभिवादन के पश्चात् मैंने डा.मुखर्जी को किसी अलग कमरे में चलने के लिये कहा जिससे मैं उनसे एकांत में सूचनाएं ले सकूं, किंतु जिला मजिस्ट्रेट ने कहा कि सरकारी आदेश के अनुसार सूचनाएं उन्हीं की उपस्थिति में और इस प्रकार दी जानी चाहिए कि वह उन्हें सुन सकें। मैंने तत्काल ऐसी सूचनाएं प्राप्त करने से इनकार कर दिया और जिला मजिस्ट्रेट के साथ जाकर दूसरे कमरे में बैठे हुए डा.मुखर्जी को बताया कि उनकी और मेरी भेंट किन शर्तों के साथ करायी जा रही है। उन्होंने मेरे साथ सहमति प्रकट की और सूचनाएं देने से इनकार कर दिया।
16 जून को प्रात: 9 बजे डा.मुखर्जी से मैं पुन: मिला। प्राय: 3 घंटे तक मेरी उनसे उन्मुक्त वार्ता हुई और मैंने उनकी ओर से प्रस्तुत होने वाले एक आवेदन तथा शपथ पत्र का मसौदा तैयार किया।
22 जून को प्रात: 10 बजे मैं डा.मुखर्जी से फिर मिला। निशातबाग जेल पहुंचने से पूर्व ही जेल सुपरिटेंडेंट ने मुझे सूचित किया कि डा.मुखर्जी अस्वस्थ हैं और डाक्टरी आदेशानुसार उन्हें नर्सिंग होम ले जाने की तैयारी की जा रही है। मैंने उनसे पूछा कि नर्सिंग होम कहां है? किंतु उन्होंने बताने में बड़ी आनाकानी की और अंतत: उसका पता नहीं दिया। मैंने डा. मुखर्जी से पूछा कि अब आपको कैसा लग रहा है। उन्होंने उत्तर दिया कि अब दर्द नहीं है और बिल्कुल चंगा अनुभव कर रहा हूं। फिर भी मुझे पूर्ण संतोष नहीं हुआ। कोर्ट का समय हो जाने के कारण मैं शाम को निश्चित रूप से मिलने का वायदा करके लौट आया। कोर्ट पहुंचने पर मैंने श्री देवकी प्रसाद को, जिन्होंने डा.मुखर्जी के मित्र के रूप में हाईकोर्ट में आवेदन दिया था, होटल से कुछ संदर्भ पुस्तकें, जो मैं वहां भूल आया था, लाने के लिये भेजा। देवकी प्रसाद ने लौटकर मुझे बताया कि उन्होंने डा.मुखर्जी को कार में शहर की ओर जाते देखा है। उन्होंने यह भी बताया कि जिस दिशा में कार जा रही थी उधर कोई भी नर्सिंग होम नहीं है।
कोर्ट का काम खत्म होने पर लगभग सवा पांच बजे मैंने जिला मजिस्ट्रेट से टेलीफोन पर कहा कि मुझे डा.मुखर्जी के पास ले चला जाए। उससे पहले मैंने कम से कम पांच नौजवानों को सभी नर्सिंग होम छान मारने के लिये भेजा था, किंतु सबने लौटकर यही कहा कि डा.मुखर्जी को किसी भी नर्सिंग होम में नहीं रखा गया। इसी बीच जिला मजिस्ट्रेट आ गये और मुझे मेरे होटल से साढ़े तीन मील दूर सरकारी अस्पताल में ले जाया गया। डा.मुखर्जी को पहली मंजिल में गायनीकोलाजिकल वार्ड के कमरा नं.1 में रखा गया था। मैंने उन्हें बिस्तर पर टिककर बैठा हुआ पाया। यद्यपि वह मुस्कुरा रहे थे किंतु काफी दुर्बल दिखाई दिये। मैंने उनसे कहा कि वह उतने चंगे नहीं हैं जितने कि सवेरे थे, किंतु उन्होंने इस बात को न माना। जिला मजिस्ट्रेट ने उन्हें पत्र आदि दिये। उन्होंने सारी डाक पढ़ी जिसमें एक पूना का तार भी था। मैंने उन्हें वह तार पढ़कर सुनाया। इसके बाद उन्होंने बिस्तर पर बैठकर किसी फर्म के कागज-पत्रों को पढ़ा और अपना फाउंटेन पेन निकालकर प्राय: 6-7 वक्तव्यों तथा दो चेकों पर दस्तखत किये।
फिर उन्होंने मुझसे किसी शैलेन के नाम एक पत्र लिखने के लिये कहा। उन्होंने मजाक किया कि "तुम्हारी लिखाई खराब है। मैं तो उसे पढ़ लेता हूं किंतु अन्य कोई नहीं पढ़ सकता। भला मैं तुम्हें पत्र कैसे लिखा सकता हूं।" मैंने वह पत्र लिखा जिसपर उन्होंने दस्तखत किये। उस समय डाक्टर ने, जो कमरे के भीतर मौजूद थे तथा मेडिकल सुपरिटेंडेंट गिरधारी लाल ने मुझे डाक्टर मुखर्जी को यह बताने के लिये कहा कि वह बिस्तर में बैठने का यत्न न करें। दस्तखत करके वह पुन: पीछे टिक गये और टिकते समय उन्होंने अपना हाथ दिल पर रखा और उनके चेहरे से ज्ञात हुआ कि उन्हें कुछ दर्द है। मैं उनसे गप्पें लड़ाता रहा और शाम को 6.15 या 6.20 तक वहां बैठा। मुझे उनकी हालत देखकर अधिक प्रसन्नता नहीं हुई।
मुझे डा.मुखर्जी की हालतअच्छी नहीं लग रही थी। मैं दूसरे दिन सुबह विमान द्वारा पठानकोट जाने का विचार कर रहा था, किंतु मैंने वह विचार छोड़ दिया और डा.मुखर्जी से कहा कि जब तक मैं उन्हें दूसरे दिन पूरी तरह प्रसन्नचित्त न देख लूंगा, कहीं न जाऊंगा। जब मैं 6.30 के करीब वहां से चलने लगा तो उन्होंने अपने लिये कुछ पत्र-पत्रिकाएं लाने को कहा। मैंने पूछा कि किस तरह का साहित्य वह पसंद करेंगे। उनके शब्द थे, "कुछ भी लाना, मगर लाना अवश्य और उस पर कुछ रुपया खर्च करना।"
पुलिस का पहरा लगा रहा, कमरे में मैंने एक नर्स को देखा था जो सदैव सेवा के लिये प्रस्तुत थी। कमरे के बाहर मुझे कुछ पुलिस वाले पहरे पर दिखाई दिये। मैंने जिला मजिस्ट्रेट से अगले दिन प्रात: 9 बजे डा.मुखर्जी से मिलने की अनुमति मांगी किंतु डाक्टर ने कहा कि मैं 8 बजे के करीब आऊं क्योंकि 9 बजे उनका एक्सरे किया जाएगा। जिला मजिस्ट्रेट ने पहरेदारों से मुझे जाने देने के लिये कहा। इस भेंट के समय श्री देवकी प्रसाद मेरे साथ थे।
इसके बाद डा.मुखर्जी के संबंध में मैंने जो कुछ सुना वह केवल 23 जून को प्रात: 4 बजे के करीब। पुलिस सुपरिटेंडेंट ने मुझे सूचित किया कि डा.मुखर्जी की हालत गंभीर है और जिला मजिस्ट्रेट ने मुझे अविलम्ब उनके पास अस्पताल आने के लिये कहा है। मैं तुरंत चल पड़ा और 4 बजने में 5 मिनट पर ही वहां पहुंच गया। उस समय डा.मुखर्जी का कमरा बंद था। एक डाक्टर मुलाकात के कमरे में बैठा था, मुझे वहीं बैठने के लिये कहा गया, किंतु मैं बेचैन हो उठा क्योंकि उस वक्त इस प्रकार बैठे रहना मेरे लिये संभव नहीं था। एक मिनट मैं जैसे-तैसे बैठा।
पुलिस सुपरिटेंडेंट ने बताया कि डा.मुखर्जी को आक्सीजन दी जा रही है। तब मैंने कहा, "हमें भीतर जाकर बैठना चाहिए। आप पता लगायें, क्या मैं भीतर जा सकता हूं।" वह भीतर गये और डाक्टर के साथ बाहर आये। डाक्टर ने मुझे बताया, "आपके आने के 5 मिनट पूर्व ही डाक्टर मुखर्जी इस संसार को छोड़ गये।" फिर मुझे कमरे में ले जाया गया। उनका शरीर कपड़े से ढका हुआ था।
पांच मिनट बाद ही जिला मजिस्ट्रेट व उप गृहमंत्री वहां आ गये। मैंने उप गृहमंत्री से बात की। मैंने उनसे कहा कि मैं पार्थिव देह को कलकत्ता ले जाऊंगा, वह व्यवस्था करें और यदि वह नहीं कर सकते तो मुझे भारत सरकार से सम्पर्क स्थापित करने की अनुमति दें। उन्होंने वायदा किया कि वह व्यवस्था करने में समर्थ होंगे। मैंने उनसे घर वालों को सूचना देने के लिये कलकत्ता से सम्पर्क स्थापित करने को कहा जिससे यह खबर उनकी माता जी को आल इंडिया रेडियो द्वारा न ज्ञात होकर किसी संबंधी द्वारा ज्ञात हो। मैं अस्पताल में ही था कि उनके तीनों सहबंदी वहां आ गये। मैंने उन्हें मृत्यु की खबर दी। चूंकि गृहमंत्री बख्शी गुलाम मोहम्मद पहले ही वहां आ चुके थे और मैंने उनसे सभी नजरबंदों को रिहा करके पार्थिव देह के साथ कलकत्ता जाने की इजाजत देने के लिए कहा था अत: तीनों व्यक्तियों को अपना सामान लाने के लिए वापस भेज दिया गया। यह प्रात: 4.35 का समय था। उप गृहमंत्री खबर देने के लिये पहले ही जा चुके थे। मैं भी 4.50 बजे पर अपने होटल लौट आया और वहां से आल इंडिया रेडियो, टाइम्स आफ इंडिया तथा युनाइटेड प्रेस आफ इंडिया के प्रतिनिधियों को फोन करके होटल में बुलाया। टाइम्स आफ इंडिया तथा आल इंडिया रेडियो के प्रतिनिधि 5 मिनट के अंदर आ गये। मैंने उन्हें यह खबर दी। तब तक उन्हें कुछ भी ज्ञात न था।
तत्पश्चात् मैंने पं.मौलिचन्द्र शर्मा तत्कालीन महामंत्री, जनसंघ से बात करने के लिए दिल्ली फोन करने का प्रयत्न किया, किंतु सफल न हो सका। मैंने जम्मू फोन करना चाहा किंतु वहां भी न कर सका। आल इंडिया रेडियो के आदमी ने मुझे बताया कि वह दो घंटे से प्रयत्न कर रहा है किंतु कोई कनेक्शन ही नहीं मिला। 8 बजे के लगभग मैं पुन: अस्पताल गया और उप गृहमंत्री से मिला। उन्होंने बताया कि कलकत्ता के लिए सीधा फोन तो नहीं मिला लेकिन वह आपरेटर के जरिए जस्टिस मुखर्जी से बात कर चुके हैं। साथ ही उन्होंने दिल्ली होकर बम्बई भी खबर भेज दी है। उन्होंने यह भी बताया कि वह 5 बजे से पूर्व ही डा.काटजू से बातचीत कर चुके हैं। इस बीच में प्राय: 500 लोग अस्पताल के बाहरी फाटक पर इकट्ठे हो गये। अत: पार्थिव देह को पीछे के दरवाजे से ले जाया गया।
8 बजे के करीब मैंने डा.मुखर्जी की चीजें मांगी। मुझे कलाई घड़ी, फाउंटेन पेन तथा एक सूटकेस दिया गया। लगभग 8.40 पर हम हवाई अड्डे के लिये रवाना हुए। मैंने जिला मजिस्ट्रेट को सहबंदियों को बुलाने के लिये कहा। मैंने उनकी रिहाई के लिये भी कहा और गृहमंत्री से पं.प्रेमनाथ डोगरा को भी मुक्त कर देने की प्रार्थना की।
9.05 पर हम हवाई अड्डे पर पहुंच गये। हवाई अड्डे पर मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला को छोड़कर सभी मंत्री उपस्थित थे। सबने बड़ा दुख प्रकट किया। वित्तमंत्री रो पड़े। जिला मजिस्ट्रेट भी पुन: रोये। मुख्यमंत्री 10.15 बजे पर आये। इस बीच भारत सरकार द्वारा भारतीय वायुसेना के डकोटा विमान का उपयोग करने में कुछ बाधा खड़ी की गई।
डा.काटजू ने विंग कमांडर से बात की, मैं नहीं कह सकता कि उन्होंने उनसे क्या कहा, क्योंकि उनके द्वारा फोन करने पर भी विंग कमांडर ने डकोटा देने से इनकार किया।
जब यह बातचीत हो रही थी शेख अब्दुल्ला वहां आ गये। सभी मंत्रियों ने पुष्पाहार अर्पित कर स्ट्रेचर को विमान में रखा। विमान 2 बजे आदमपुर हवाई अड्डे पर उतरा और वहां 2.30 बजे हम रवाना हुए फिर कानपुर के सैनिक हवाई अड्डे पर उतरे। पेट्रोल लेने के बाद वहां से 5.30 बजे चले। कानपुर में हमने कलकत्ता की दूरी को जोड़ा तो पता चला कि अभी 560 मील चलना बाकी है। अफसर ने मुझे बताया कि 9 बजे से पूर्व कलकत्ता नहीं पहुंच सकते। वह पूरी कोशिश करेंगे तब भी 9 बजे से पहले पहुंचना संभव नहीं है। हम जब कलकत्ता पहुंचे तो 9 बजने में 5 मिनट थे। पं.गुरुदत्त वैद्य का वक्तव्य पढ़ने और उनके द्वारा कही हुई बातों को अपनी व्यक्तिगत जानकारी से, जिसे मैंने अपने वक्तव्य में रखा है, तुलना कर लेने के बाद मैं इन महत्वपूर्ण निष्कर्षों पर पहुंचा हूं-
1-22 जून को प्रात: 9 बजे रोग का प्रथम आघात होने के बाद भी डा.मुखर्जी को पूर्ण विश्राम की सलाह नहीं दी गयी। 2-उन्हें अविलम्ब अस्पताल नहीं ले जाया गया और 6 घंटे का बहुमूल्य समय गंवा दिया गया। 3-एम्बुलेंस में अस्पताल न ले जाकर उन्हें एक छोटी सी टैक्सी से कष्टदायक स्थिति में ले जाया गया। 4-अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी उन्हें तुरंत डाक्टरी सहायता नहीं दी गई। 6-जेल सुपरिटेंडेंट से सवेरे ही डाक्टर मुखर्जी को अस्पताल ले जाने को कहा गया था किंतु उन्होंने (जान-बूझकर) समय बरबाद किया और घंटे सवा घंटे तक श्री रैना से गप्पे लगाते रहे। 7-उन्हें जो दवा दी गई वह ह्मदय रोग की दृष्टि से पूर्ण विचार करने के बाद नहीं दी। 8- इलाज में डा.मुखर्जी की शरीरावस्था तथा उनके स्वास्थ्य की पुरानी स्थिति का ध्यान नहीं रखा गया था। 9-निदान करने वाले डाक्टर ने इलाज का काम अपने सहायक के हाथ में छोड़ दिया था जो डा.मुखर्जी से बिना पूछे अपना काम करता रहा। यहां तक कि उसने स्ट्रेप्टोमाइसिन की मात्रा कम कर देने तथा सेडेटिव्स न देने के डा.मुखर्जी के सुझावों को भी अनसुना कर दिया था।
प्रस्तुति-गिरीश नारायण पांडेय (भारतीय जनसंघ द्वारा प्रकाशित पुस्तिका "मृत्यु या हत्या" से साभार)
