पथरी का पौधा की सब्जी खाना प्रारम्भ कर दे तब पथरी गल कर बह जाती है |


                                   
गिरिजा शंकर शुक्ल :  मित्रों यह पथरी है,इसे पहचान लें | पथरी नाम इस लिये नहीं है कि यह पथरी बनाता है वरन इस लिये है कि यह पथरी समाप्त करता है | आज इसके गुणों पर बात करते हैं | यह आजकल गर्मियों में बहुतायत पाया जाता है | वैसे इसे पथरी,पत्थरचूर,(यहां कुछ लोग इसे भी पत्थरट्टा ही कहते हैं) व गदपूरना भी कहते हैं |
१- यदि किसी भाई को पथरी हो जाय तब वह यदि इसकी सब्जी खाना प्रारम्भ कर दे तब उसकी पथरी गल कर बह जाती है |
२- यदि किसी के कोई फोड़ा या बालतोड़ हो जाय तब चिकित्सक के पास जाने पर वह सूमैग दवा की पट्टी बांधता है (पट्टी करने का व्यय लगभग दस रूपये मान लें ) जो कभी-कभी दो दिन में पकाती है | तब चीरा लगाता है व सुखाने की दवा बांधता है | यह तो लगभग प्रत्येक भाई-बहन अनुभव किये होंगे | अब यदि कभी फोड़ा फुंसी हो जाय तब यह प्रयोग कीजिये,विधि है-    पथरी का पौधा लाकर धो लें व सूखी-सूखी चटनी की तरह पीस लें | फिर सोते समय उस फोड़े पर एक लेप की तरह चिपका दें | यदि अधिक जल्द असर चाहिये तब उस चटनी में थोड़ा नमक मिला लें व सेंक लें | फिर उस फोड़े पर लेप लगा दें | यह लेप तीन तरह से काम करता है  !    क) यदि वह फोड़ा दबने योग्य होगा तब उसे रात भर में दबाकर गायब कर देगा |  ख) यदि वह पकाने योग्य होगा तब रातभर में पकाकर बहा देगा | ग) यदि इस रात नहीं बहा तब,पुनः लगाने पर उसे पूर्णरूपेण पकाकर मुंह बनाकर पूरी तरह मवाद आदि को निकाल देगा | इस प्रकार आप डाक्टरों के चक्कर,व्यर्थ धन व्यय,चीरा,दर्द व शारीरिक कष्ट से बच जाते हैं |
३- इसमें पुनर्नवीन तत्व होता है जो पुनर्नवा की भांति गुणकारी बना देता है इस वनस्पति को | यह लिवर आदि को भी संभवतः मजबूत करता है |इसे लंगूर प्रिय मन से खाते हैं | विशेषतः इसकी सब्जी खाने से पतली दस्त होकर पेट साफ हो जाता है | अतः विशेष परिस्थितियों में ही खायें,परन्तु फोडये आदि के लिये स्वानुभूत रामबाण प्रयोग है |
संस्कृत पुनर्नवा? : यह पुनर्नवा का दूसरा रूप है,पुनर्नवीन इसमें भी होता है | इसमें व पुनरनवा में मुख्य अंतर यह है कि पुनर्नवा शुष्क रूखा व पथरी मांशल व लिसलिसा होता है | यह जमीन पर फैलता है व पुनर्नवा झाड़ियों पर भी चढ़ जाता है |