13 अक्टूबर को ही राणा ने कहा था कि - साहित्य अकादमी का अवार्ड केवल 1 लाख का होता है, इसीलिए हर कोई इसे लौटा रहा है, अगर यही 25 लाख होता तो कोई नहीं लौटाता. इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा था कि - दंगों के शिकार को अगर एक करोड़ मिलने लगे तो कोई दंगे नहीं होंगे.अब कल टी. वी. चैनल पर दिवेट के बहाने आकर , अवार्ड लौटाने का नाटक करने का क्या मतलब है ? कही ऐसा तो नहीं कि - चैनल वाले ने उनको ऐसा करने के लिए पैसे दिए है. बैसे भी मुनब्बर राणा कह चुके हैं कि 1 लाख का कोई ख़ास महत्त्व नहीं है लेकिन 25 लाख के लिए तो वे भी कुछ कर ही सकते हैं......Nageshwar Singh Baghel
मुनव्वर राना जी ! आपको सम्मान लौटाने की जरूरत नहीं थी क्योंकि आपका सम्मान तो देश की नज़र में उसी दिन क्षतिग्रस्त हो गया था जब एक मुशायरे में आपने बड़े दम्भ से कहा था कि पाकिस्तान से आपकी बहन के भारत आने के लिए वीज़ा का प्रॉब्लम सॉल्व करने के लिए रात को 9 बजे यहां कार्यालय खुलवाया गया था ।
आप एक विद्या में पारंगत तो हुए लेकिन "कलाकार कम चाटुकार" बनकर आपने दिखा दिया कि 'बिकाऊ कला' राजनीति के चरणों में कैसे लोट जाती है ...जिस मातृभूमि को शहीद भगत सिंह ने जननी से ऊँचा दर्जा दिया उसे आपने (माँ पर बेहतरीन पंक्तियाँ लिखने वाले ने) ये कहके दुत्कारा कि इस देश की सत्ता रायबरेली की नालियों से होकर गुजरती थी ?...........................Sanjeev Mishra


इसे कहते हैं दलाली न्युज का प्रत्यक्ष उदाहरण .....सुनियोजित घटना. .मै पूछता हूँ क्या सरकार की मुश्किलें बढेगी ऐसे चैनलो से ...मत भूलो ऐसे बहुत प्रहार झेले है पंद्रह सालों से उस नरेंद्र मोदी ने. .तेरे जैसे हरामी चैनल क्या सरकार को मुश्किल में खडा करेगी देखा जायेगा .....और ये जो रट लगा रखी है #आपातकालकी इसका मतलब होता है संविधान द्वारा प्रदान किये गये मौलिक अधिकारोँ का ख़त्म हो जाना, परन्तु जिस प्रकार देश का तथाकथित बुद्धिजीवी और सेक्युलर वर्ग मीडिया मे आकर देश के बहुमत से चुने प्रधान मंत्री को गाली दे रहा है और TV NEWS CHANNELS की TRP को बढ़ा रहा है उससे तो लगता है कि अब भारत दुनियाँ का सबसे मजबूत लोकतंत्र बन कर उभर रहा है । कम से कम मोदी के सत्ता में आने से उस वर्ग की पहचान तो आसान हो रही है जो आज भी देश को पाषाण युग में धकेलने पर आमादा है ।जो भी हो शायद इसमें भी कुछ अच्छाई छिपी हो ..........भगवांन जाने....Amit Garg
Lalchi Dhamecha अभी चार दिन पहले ही सार्वजनिक तौर पर अवार्ड लौटाने वाले साहित्यकारों से " नाइत्तफाकि " व्यक्त करने वाले प्रतिष्ठित उर्दू शायर जनाब मुनव्वर राणा को अचानक क्या हो गया? गुजरे 3 दिनों में तो कोई उल्लेखनीय घटना भी नहीं घटी ?
मुनव्वर राणा ने पुरस्कार लौटा दिया क्योकि अब सत्ता रायबरेली की नालियो से नहीं काशी के पवित्र घाटों से निकलती है।...............Sanjay Bengani
Rajan Dharmesh Jaiswal प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थी जैसे उनपर कोई भारी दबाव हो और न चाहते हुए भी अवार्ड वापसी की मज़बूरी।