Puneet Guptaमैं तथाकथित बुद्धिजीवी हूँ एवं साहित्यकार हूँ।कोरी लफ़्फ़ाज़ी करता हूँ पूरा चाटुकार हूँ। मैं हूँ असल में पैरासाइट लहू ग़रीबों का पीता।उनकी हालत लिख करके मैं अकादमी अवार्ड जीता।आज है मौक़ा वापस कर दूं यह अवार्ड बहाने से।खोयी ख्याति मिलेगी मुझको पुरस्कार लौटाने से।
चाटुकारी से मैंने तो साहित्य अवार्ड यह पाया था।कितनों की चुगली कर अपने रस्ते उन्हें हटाया था।
कितनों की थी लिखी वंदना चरणों शीश नवाया था।कितनों के जूतों को मैंने स्याही से चमकाया था।
लेकिन अब तो मिट ही चला था मेरा नाम ज़माने से।खोयी ख्याति मिली है मुझको पुरस्कार लौटाने से।
गोरों (कोंगी , मुगलों ) के गुणगान में मैंने भर लिख डाली पोथी थी। और स्वदेशी मुंह पर मैंने कलम
से कालिख पोती थी।लिख भूख पर कविता मैं मंचों पे ताली पाता था। बेघर की मैं व्यथा सुनाकर AC में सो जाता था।
मुझको फ़ुरसत रही कहाँ थी मोटा माल कमाने से।खोयी ख्याति मिली है मुझको पुरस्कार लौटाने से।
अनपढ़ बालक की कथा छपाकर मैंने नाम कमाया है।उसी के बल अपने बच्चों को पब्लिक स्कूल पढ़ाया है।
मैंने मजदूरन की बिलकुल तार-तार की धोती है।जिसको पढ़ आंसू से पत्नी रेशम पल्लू भिगोती है।
बंगला खड़ा कर लिया मैंने यह अवार्ड भुनाने से।खोयी ख्याति मिली है मुझको पुरस्कार लौटाने से।
मगर विगत कुछ सालों से ये गैया दूध नहीं देती।पूछ रहा करती थी अपनी अब तो पूँछ नहीं रहती।
सरकारी ऑफिस से अब मिलता भत्ता भी बंद हुआ।मधुमक्खी से भिनके चमचों का छत्ता भी बंद हुआ।
नयी जवानी आ गई निजात है मिली बुढ़ाने से।खोयी ख्याति मिली है मुझको पुरस्कार लौटाने से।
मुझे नहीं कुछ लेना सिखों के ज़िंदा जल जाने से।मुझे नहीं परवाह गोधरा में यूँ आग लगाने से।
लाखों कश्मीरी पंडित को घर से मार भगाने से।कांग्रेस के राज निर्भया की अस्मत लुट जाने से।
मुझे पड़ेगा फ़र्क़ किसी अख़लाक़ के मारे जाने से?खोयी ख्याति मिली है मुझको पुरस्कार लौटाने से।
आज रिपोर्टर ढेरों आगे पीछे मेरे घूम रहे।कई सिकुलर चमचे फिर से मेरी चप्पल चूम रहे।
अख़बारों ने उठा हाशिये से सुर्खी में डाला है।कई दलों ने पहनाई फिरसे नोटों की माला है।
हो गया अपना उल्लू सीधा मोदी के आ जाने से।खोयी ख्याति मिली है मुझको पुरस्कार लौटाने से।.....-पुनीत "कुमार"


मुझको फ़ुरसत रही कहाँ थी मोटा माल कमाने से।खोयी ख्याति मिली है मुझको पुरस्कार लौटाने से।
अनपढ़ बालक की कथा छपाकर मैंने नाम कमाया है।उसी के बल अपने बच्चों को पब्लिक स्कूल पढ़ाया है।
मैंने मजदूरन की बिलकुल तार-तार की धोती है।जिसको पढ़ आंसू से पत्नी रेशम पल्लू भिगोती है।
बंगला खड़ा कर लिया मैंने यह अवार्ड भुनाने से।खोयी ख्याति मिली है मुझको पुरस्कार लौटाने से।
मगर विगत कुछ सालों से ये गैया दूध नहीं देती।पूछ रहा करती थी अपनी अब तो पूँछ नहीं रहती।
सरकारी ऑफिस से अब मिलता भत्ता भी बंद हुआ।मधुमक्खी से भिनके चमचों का छत्ता भी बंद हुआ।
नयी जवानी आ गई निजात है मिली बुढ़ाने से।खोयी ख्याति मिली है मुझको पुरस्कार लौटाने से।
मुझे नहीं कुछ लेना सिखों के ज़िंदा जल जाने से।मुझे नहीं परवाह गोधरा में यूँ आग लगाने से।
लाखों कश्मीरी पंडित को घर से मार भगाने से।कांग्रेस के राज निर्भया की अस्मत लुट जाने से।
मुझे पड़ेगा फ़र्क़ किसी अख़लाक़ के मारे जाने से?खोयी ख्याति मिली है मुझको पुरस्कार लौटाने से।
आज रिपोर्टर ढेरों आगे पीछे मेरे घूम रहे।कई सिकुलर चमचे फिर से मेरी चप्पल चूम रहे।
अख़बारों ने उठा हाशिये से सुर्खी में डाला है।कई दलों ने पहनाई फिरसे नोटों की माला है।
हो गया अपना उल्लू सीधा मोदी के आ जाने से।खोयी ख्याति मिली है मुझको पुरस्कार लौटाने से।.....-पुनीत "कुमार"

